शुशिला कुमारी, महतो
खोज तलास खबर, जनकपुरधाम ! इ समाजेके बान्हल बन्धन या हइ कोनो एगो डोर यौ
एकरा जते खिचु ओते नमरे नइ खिचु त भेल छोट यौ ।
एकेलोग लागे बड निमन त ककरो लागे बड बेजाइ यौ,
आगु कहे तोरासंन नइ कोइ ? त पाछु करे बड हिमताइ यौ।।
कोइ देखाबे अलग चाल त कोइ अलग व्यवहार
कोइ करे बड बड बात त कोइ करे बड स्यहार ।
मुर्ख बनल ग्यानी कदैय बोलिएसे सबके फेल
परहल करे अपने मनमानी रहेनै ककरोसे मेल ।।
कुछो कैलासे नै वदैल सकैब ,ककरो बोली
मनके घाउ अते वरहल लागे लाइगगेल बन्दुकके गोली ।
चाहे कलु कतवो निमन चाहे करु बैमानी,
सबकोहि बुझे अपने हिसाबसे कके अपने मनमानि।।







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